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Kabir ke dohe : संत कबीर दास के 50+ दोहे अर्थ सहित

Kabir ke dohe

Kabir ke dohe : संत कबीर दास के 50+ दोहे अर्थ सहित : संत कबीर दास के दोहे गागर में सागर के समान हैं। उनका गूढ़ अर्थ समझ कर यदि कोई उन्हें अपने जीवन में उतारता है तो उसे निश्चय ही मन की शांति के साथ-साथ ईश्वर की प्राप्ति होगी।

जब भी हम दोहों के बारे में बात करते है तो संत कबीर का नाम सबसे पहले आता है, उनके साहित्य के योगदान को कभी भी नहीं भुलाया जा सकता, उनकी रचनाएँ, भजन, और दोहे बहुत प्रसिद्ध है। कबीर दास ने अपने समय के बड़े-बड़े दिग्गजों को और समाज की तमाम धार्मिक कुरीतियों को खुली चुनौती दी । सबसे बढ़कर, कबीर दास ने ज़िन्दगी जीने का जो तरीका सामने रखा, वह बेमिसाल था ।

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Kabir ke dohe पढने से हमेशा हमारे मन को शांति मिलती है| कभी भी आप कोई मुश्किल में हो, कोई कठिनाई से गुजर रहे हो तो kabir das ke dohe को ध्यान से पढ़े आपको जरुर उस परेशानी से छुटकारा मिलेगा |

 

कबीर दास जी कौन थे?

कबीर हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व हैं। कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे, जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी।

हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है। गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व कबीर के सिवा अन्य किसी का नहीं है। कबीर की उत्पत्ति के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगद्गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कतिपय कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी योगी के औरस तथा प्रतीति नामक देवाङ्गना के गर्भ से भक्तराज प्रहलाद ही संवत् १४५५ ज्येष्ठ शुक्ल १५ को कबीर के रूप में प्रकट हुए थे |

 

Kabir ke dohe :-

इस पोस्ट में मैं आपको कुछ प्रसिद्ध kabir das ke dohe बताने जा रहा हूँ  और साथ में मैं आपको  Kabir ke dohe का अर्थ भी समझाऊंगा |

 

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

अर्थ : माला फेरते-फेरते युग बीत गया लेकिन मन में जमी बुराइयां नहीं हटीं । इसीलिए, यह लकड़ी की माला को हटा कर मन की साधना करो!)

कबीर ने ऐसे ही ढोंगी लोगों पर, जो ऊपर से अपने आप को शुद्ध और महान दिखाने की कोशिश करते हैं, व्यंग्य कसते हुए कहा था |

 

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय | सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय ॥

अर्थ : (kabir ke dohe in hindi) इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे |

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय॥

 

अर्थ : कबीर दास जी अपने इस दोहे (kabir das ke dohe) के माध्यम से कहते है  कि अगर गुरु और भगवान् दोनों एक जगह पे खड़े हो तो सबसे पहले किसके पैर चुना चाहिए ?

कबीर दास जी का कहना गुरु ने अपने ज्ञान से भगवान् से मिलने का रास्ता बताया है, इसलिए स्वर्प्रथम हमे गुरु के पैर छूना चाहिए ||

 

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ॥

 

अर्थ : इस जग में बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर न जाने कितने लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए परन्तु सभी विद्वान तो न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही भली प्रकार से पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही असल में सच्चा ज्ञानी होगा।|

 

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय॥

अर्थ : (kabir ke dohe in hindi) मन में धीरज रखने से सब कुछ हो जाता है | अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा ||

 

ऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय॥

अर्थ :  अपने मन के सभी अहंकार को मिटाकर , ऐसे मीठे और नम्र वचन बोलो, जिससे दुसरे लोग सुखी हों और स्वयं भी सुखी हो |

 

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान

अर्थ : किसी भी वयक्ति के जाती को छोड़कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए, तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।

 

कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय। साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय॥

अर्थ :  उल्टी-पल्टी बात बकने वाले को बकते जाने दो, तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर। साकट (दुष्टों)तथा कुत्तों को उलट कर उत्तर न दो।

 

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई । अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई॥

अर्थ : कबीर कहते हैं – प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा  – जिससे अंतरात्मा  तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया – खुश हाल हो गया – यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है ! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीये ||

 

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर । जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर

अर्थ : (kabir das ke dohe) जो इंसान दूसरों की दुःखको समझता है वही सच्चा इंसान होता है । जो दूसरों के कष्ट को ही नहीं समझ पाता, ऐसा इंसान भला किस काम काम का नही होता है |

 

कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव । सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥

अर्थ : (kabir ke dohe)कबीर दास जी का कहना है कि जिस वयक्ति ने जीवन में कभी प्रेम का स्वाद नही लिया है, वह उस अतिथि के समान है जो सुने घर में आकर खली हाथ लौट जाता है |

 

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय । सारसार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय 

अर्थ : (kabir ke dohe in hindi) एक अच्छे इंसान को सुप के जैसा होना चाहिए, जो अनाज को तो रख लेता है लेकिन उसके छिलके और ख़राब अनाज को बाहर कर देता है |

 

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बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि 

अर्थ : (kabir ke doheयदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है |

 

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय  होएगी, बहुरि करोगे कब॥

अर्थ : कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से कहना चाहते है कि जो काम कल करने वाले हो उसे आज करो, जिस काम को आज करने वाले हो उसे अभी करो | कुछ ही समय में तो जिंदगी खत्म हो जायेगी फिर कब करोगे काम को ||

 

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥

अर्थ : (kabir ke dohe) न तो ज्यादा बोलना अच्छा है, न ज्यादा चुप बैठना अच्छा हैं | जिस तरह ना ज्यादा वर्षा अच्छा है ना ज्यादा धुप अच्छा है ||

 

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय । जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय॥

अर्थ : दुःख के वक़्त सभी ईश्वर को याद करते है लेकिन सुख के वक्त कोई याद नही करता | कबीर दास जी का कहना है कि अगर सुख के समय ईश्वर को याद करोगे तो दुःख कभी आयेगी ही नही  ||

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झूठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत | राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत ॥

अर्थ : (kabir ke dohe in hindi) हे मनुष्य ! ये संसार झूठा और असार है जहाँ कोई अपना मित्र और सम्बंधी नहीं है | इसलिए तू राम – नाम के सच्चाई को जान ले तो ही इस भवसागर से मुक्ति मिल जाएगी ||

 

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर | ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर ॥

अर्थ : कबीर जी इस संसार में आकर बस यही चाहते है, कि अगर किसी से दोस्ती ना हो तो दुश्मनी भी ना हो ||

 

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये, ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये ॥

अर्थ : कबीर जी इस दोहे में कहते है कि जब हम पैदा हुए थे तो सब हँस रहे the और हम रो रहे थे | लेकिन अपने जिन्दगी में कुछ ऐसा कर जाइये कि जब आप इस दुनिया से जाए तो दुनिए रोये लेकिन आप हँसे ||

 

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना ॥

अर्थ : (kabir ke dohe) कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

 

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे 

अर्थ : मिट्टी कहती है कुम्हार से कि आज तुम मुझे रौंद रहे हो , मगर एक दिन ऐसा आएगा कि तुम भी मिट्टी बन जाओगे और मई भी तुम्हे रौंद दूंगी |

 

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय। जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय ॥

अर्थ :  ‘आहारशुध्दी:’ जैसे खाय अन्न, वैसे बने मन्न लोक प्रचलित कहावत है और मनुष्य जैसी संगत करके जैसे उपदेश पायेगा, वैसे ही स्वयं बात करेगा। अतएव आहाविहार एवं संगत ठीक रखो।

 

बन्दे तू कर बंदगी, तो पावै दीदार, औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार 

अर्थ : (kabir ke dohe)  हे सेवक! तू सद्गुरु की सेवा कर क्योंकि सेवा के बिना उसका स्वरूप – साक्षात्कार नहीं हो सकता है | तुझे इस मनुष्य जन्म का उत्तम अवसर बारम्बार न मिलेगा ||

 

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय 

अर्थ : कबीर दास जी कहते है कि हे प्रभु मुझे ज्यादा धन दौलत नही चाहिए | मुझे सिर्फ इतना ही दीजिये जिससे मेरे परिवार के लोग भी भूखा ना रहे और मेरे द्वार से कोई भूखा भी ना जाये ||

 

कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत। साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत 

अर्थ : गुरु कबीर साधुओं से कहते हैं कि वहाँ पर मत जाओ, जहाँ पर पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो। क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के महत्व को नहीं जानेंगे, केवल शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है’।

 

तो फ्रेंड्स यह थे kabir ke dohe अर्थ सहित हिंदी में, हमें विश्वास है की यह दोहे आपके जीवन को आसान और समृद्ध बनाने में बहुत ही उपयोगी साबित होंगे ।

 

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